क्रिसमस पर कब से बनना शुरू हुआ केक?

 

History of Christmas cake : भारत में भी क्रिसमस केक या पुडिंग का चलन है। थोड़े-बहुत अंतर को छोड़ दें, तो तरीका बिल्कुल अंग्रेजों जैसा ही है। अपने देश में कैसे शुरू हुआ क्रिसमस केक का चलन, जानिए uplive24.com पर।

History of Christmas cake : क्रिसमस पुडिंग का चलन अब यूरोप ही नहीं, भारत में भी है। इसका आनंद उठाने के लिए इंग्लैंड में होने की जरूरत नहीं। बीते कुछ बरसों से बेकरी और रेस्तरां में सूखे मेवों से भरे और ब्रांडी में तैयार किए गए केक मिलने लगे हैं। ठीक इसी तरह के केक या पुडिंग इंग्लैंड और आयरलैंड में मिलते हैं। भारत में अंतर यह है कि ब्रांडी की जगह रम का इस्तेमाल किया जाता है।

नवंबर के अंत में केक मिक्सिंग सेरेमनी भी आयोजित होने लगी है। यह एक पुरानी अंग्रेजी परंपरा 'स्टिर अप संडे' से मिलती-जुलती है। 'स्टिर अप संडे' में एक परिवार के सभी लोग केक बैटर को घड़ी की उल्टी दिशा में पूर्व से पश्चिम की ओर हिलाते हैं। 

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विक्टोरियन दौर में केक बैटर को प्लम पुडिंग भी कहा जाता था (History of Christmas cake)। कहानी के मुताबिक, बेथलहम के तारे का अनुसरण करते हुए ईस्ट की दिशा से बेबी जीसस को देखने आए थे वाइजमैन। यही वजह है कि बर्तन में रखे केक के बैटर को ईस्ट से वेस्ट के क्रम में चलाया जाता है।

क्रिसमस केक को प्लम पुडिंग कहा जाता है। अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्यों? तो इसे समझने के लिए हमें क्रिसमस केक या पुडिंग के इतिहास (History of Christmas cake) के बारे में थोड़ा जानना होगा। 

ओवन और बेकिंग की इजाद से पहले कुकिंग की सामान्य तकनीक थी स्टीमिंग यानी भाप से पकाना। आटा, मांस, मक्खन या चर्बी, मसाले, चीनी और नमक को अक्सर एक साथ मिलाया जाता और फिर उबाल दिया जाता। सर्द महीनों में इसे पोषण और गर्मी के लिए खाते थे। मध्यकाल के यूरोप में तो पुडिंग मीट से ही बनती थी। इसे खराब होने से बचाए रखने के लिए इसमें चीनी भी डालते थे। जिन लोगों के पास पैसा होता, वे मक्खन के साथ अनाज और सूखे मेवे भी मिला देते (History of Christmas cake)। 

यहीं से क्रिसमस के आसपास यानी जब सर्दी चरम पर हो, तो पुडिंग बनाने की शुरुआत हुई। 18वीं और 19वीं शताब्दी में इसे बनाने के तरीके में थोड़ा बदलाव आया। बैटर को कपड़े में बांधकर भाप से पकाया जाने लगा। विक्टोरियन युग के आगमन के साथ जैसे-जैसे अंग्रेजों का साम्राज्य बढ़ा, वैसे-वैसे क्रिसमस पुडिंग स्पेशल आइटम होती गई। 

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इसे बनाना भी महंगा हुआ। बैटर में सूखे मेवे और किशमिश डाले जाने लगे। बड़े परिवारों में क्रिसमस से पहले पुडिंग तैयार होने लगी। पहले ही पुडिंग बनाए जाने की हालत में इसे बार-बार गरम करना पड़ता। इसके लिए इसे दोबारा स्टीम करते, ऊपर थोड़ी ब्रान्डी डालते और आग लगा देते। आजकल इसे ही हम फ्लेमबिइंग कहते हैं (History of Christmas cake)।

केक और उपनिवेश का मिश्रण

साल 1927 में क्रिसमस पुडिंग की कहानी ने एक नया मोड़ लिया। उस समय एम्पायर मार्केटिंग बोर्ड ने एक खास योजना बनाई। इसका मकसद यह था कि ब्रिटिश साम्राज्य के अलग-अलग उपनिवेशों में पैदा होने वाली चीजों की मांग बढ़ाई जाए।

इस योजना के तहत शाही परिवार से कहा गया कि वे राजा और रानी के लिए बनने वाली क्रिसमस पुडिंग की रेसिपी साझा करें। शाही रसोई में यह पुडिंग आम तौर पर 40 लोगों के लिए बनती थी, लेकिन आम लोगों के लिए इसे बदलकर 8 लोगों के हिसाब से छापा गया।

इस रेसिपी की सबसे खास बात यह थी कि इसमें साफ-साफ बताया गया था कि ब्रिटिश साम्राज्य के किस उपनिवेश से कौन-सी चीज आएगी। यही वजह है कि इसे नाम दिया गया एम्पायर क्रिसमस पुडिंग।

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इस पुडिंग में साइप्रस की ब्रांडी, वेस्टइंडीज का जायफल, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका की किशमिश, कनाडा का सेब, जमैका की रम, इंग्लैंड की बीयर और भारत या श्रीलंका की पिसी हुई दालचीनी इस्तेमाल की गई।

इस तरह एक साधारण-सी दिखने वाली क्रिसमस पुडिंग असल में पूरे ब्रिटिश साम्राज्य की कहानी बन गई, जिसमें हर उपनिवेश की भागीदारी दिखाई देती थी। (History of Christmas cake)

समय के साथ स्टीमिंग का भी तरीका बदला। विक्टोरियन लोगों ने डबल बॉयलर तकनीक का उपयोग करना शुरू किया। बैटर को एक गोल केक टिन में भरकर पानी में रखते और कम आंच पर घंटों तक गर्म किया जाता। आज भले ही किचन में उपलब्ध अलग-अलग मशीनों के कारण यह प्रक्रिया छोटी हो गई हो, लेकिन सबसे अच्छी पुडिंग अब भी डबल बॉयलर पर बेक या स्टीम करके ही बनाई जाती है।

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